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Home » भ्रष्टाचार की जांच निजी जानकारी नहीं… अवैध वेंडिंग मामले में RPF की दलील केंद्रीय सूचना आयोग ने की खारिज, दिए कड़े निर्देश
देश/दुनिया

भ्रष्टाचार की जांच निजी जानकारी नहीं… अवैध वेंडिंग मामले में RPF की दलील केंद्रीय सूचना आयोग ने की खारिज, दिए कड़े निर्देश

Ocean News DeskBy Ocean News DeskJuly 2, 2026
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कोलकाता: “भ्रष्टाचार और कदाचार की जांच रिपोर्ट कोई निजी जानकारी नहीं होती, जिसे जनता से छुपाया जा सके.” चक्रधरपुर (CKP) डिवीजन में ‘अवैध वेंडिंग’ से जुड़े एक मामले में रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को कड़ी फटकार लगाते हुए केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने यह तल्ख टिप्पणी की है.

आयोग ने आरपीएफ प्रशासन की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें जांच रिपोर्ट को ‘गोपनीय’ बताकर जानकारी देने से इनकार किया गया था.

सूचना आयुक्त स्वागत दास की पीठ ने इसे सूचना के अधिकार (RTI) की मूल भावना का उल्लंघन मानते हुए रेलवे को सख्त निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर शिकायतकर्ता को जांच की मौजूदा स्थिति (Status Report) और अंतिम निष्कर्ष अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराए.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला जमशेदपुर के निवासी अनिल कुमार द्वारा दायर एक आरटीआई (RTI) आवेदन से जुड़ा है. उन्होंने चक्रधरपुर डिवीजन में आरपीएफ मुख्यालय द्वारा अवैध वेंडिंग की शिकायत पर की गई जांच की रिपोर्ट और उससे संबंधित दस्तावेजों की मांग की थी.

हालांकि, तत्कालीन जन सूचना अधिकारी (CPIO) और प्रथम अपीलीय अधिकारी (FAA) ने पारदर्शिता बरतने के बजाय आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) (व्यक्तिगत जानकारी) और धारा 8(1)(g) (शारीरिक सुरक्षा को खतरा) का हवाला देकर सूचना देने से साफ मना कर दिया था.

विभाग के इस अड़ियल रुख के खिलाफ शिकायतकर्ता ने केंद्रीय सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई इस सुनवाई में शिकायतकर्ता का पक्ष प्रमोद कुमार ने और रेलवे का पक्ष एएससी (आरपीएफ/चक्रधरपुर) अमरेश चंद्र सिन्हा ने रखा.

सुनवाई के दौरान आयोग की तीखी टिप्पणी

मामले के दस्तावेजों का गहन अध्ययन करने के बाद सूचना आयुक्त स्वागत दास की पीठ ने रेलवे सुरक्षा बल के रवैये पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया. आयोग ने दो टूक शब्दों में कहा कि जन सूचना अधिकारी (PIO) ने शिकायतकर्ता को जानकारी न देकर आरटीआई अधिनियम की मूल भावना का उल्लंघन किया है.

आयोग का मुख्य वक्तव्य

“जब कोई सजग नागरिक किसी विभाग में गड़बड़ी या कदाचार के खिलाफ आवाज उठाता है और शिकायत दर्ज कराता है, तो उसे यह जानने का पूरा कानूनी अधिकार है कि उसकी शिकायत पर क्या कार्रवाई (Action Taken) की गई. इसे किसी तीसरे पक्ष की निजी जानकारी कहकर छुपाया नहीं जा सकता.”

दिल्ली उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का हवाला

केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने इस आदेश को कानूनी रूप से सुदृढ़ करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले कमल भसीन बनाम राधा कृष्ण माथुर (2017) का संदर्भ दिया. इस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने साफ कहा था कि भ्रष्टाचार या कदाचार की शिकायतों पर सतर्कता विभाग (Vigilance) द्वारा की गई जांच और उसका अंतिम परिणाम पूरी तरह से सार्वजनिक हित (Public Interest) के दायरे में आता है.

अदालत ने माना था कि भले ही विभाग के आंतरिक अधिकारियों की फाइल टिप्पणियां गोपनीय रखी जा सकती हैं, लेकिन शिकायत का अंतिम नतीजा शिकायतकर्ता को बताना ही होगा.

समय सीमा और कड़े निर्देश

केंद्रीय सूचना आयोग ने सीपीआईओ (CPIO) पर जुर्माना लगाने से तो यह कहकर राहत दे दी कि सूचना रोकने के पीछे कोई दुर्भावना नहीं बल्कि गलत कानूनी धारणा थी. लेकिन, आयोग ने रेलवे प्रशासन को सख्त हिदायत दी है कि: आदेश प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर शिकायतकर्ता को जांच की वर्तमान स्थिति और अंतिम नतीजा हर हाल में सौंपा जाए.

यह जानकारी शिकायतकर्ता को बिल्कुल मुफ्त प्रदान की जाएगी.

यदि मांगी गई सूचना किसी अन्य विभाग से संबंधित है, तो मुख्य पीआईओ आरटीआई अधिनियम की धारा 5(4) के तहत संबंधित अधिकारी से सहायता लेकर समय सीमा के भीतर सूचना सुनिश्चित करेंगे. अधिकारी अब किसी भी तरह के टालमटोल का बहाना नहीं बना सकते.

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