जमशेदपुर. दूसरों की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए चौबीसों घंटे मुस्तैद रहने वाले खाकी के जवानों की जिंदगी आज खुद असुरक्षित हो गई है. महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले होमगार्ड जवानों के घरों में पिछले चार महीनों से चूल्हा जलना भी दूभर हो चुका है.
विभाग की घोर लापरवाही और वेतन भुगतान में हो रही अवांछनीय देरी ने इन जवानों को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ जिंदगी और मौत के बीच का फासला मिटने लगा है. महज 10 दिनों के भीतर दो महिला होमगार्ड जवानों की बेबसी और चीख-पुकार ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
दस दिन, दो खौफनाक मंजर, व्यवस्था के मुंह पर तमाचा
अस्पताल परिसर में सुरक्षा की कमान संभालने वाले कुल 135 होमगार्ड जवान इस समय घोर आर्थिक और मानसिक प्रताड़ना के दौर से गुजर रहे हैं. पहली दिल दहला देने वाली घटना बीती 8 जुलाई को सामने आई, जब कॉलेज परिसर में ड्यूटी पर तैनात महिला जवान अलादीन महाली ने आर्थिक तंगी से तंग आकर फिनाइल पीकर खुदकुशी करने की कोशिश की.
समय रहते इलाज मिलने से उनकी जान तो बच गई, लेकिन अस्पताल के बेड से जो सच उन्होंने बयां किया, वह दिल चीरने वाला था. अलादीन ने रोते हुए बताया कि उनकी बूढ़ी मां बीमार हैं, इलाज के लिए पैसे नहीं हैं और बेटे की स्कूल फीस न भरने के कारण उसकी पढ़ाई छूटने की कगार पर है.
अभी प्रशासन इस सदमे से उबरा भी नहीं था कि शनिवार की सुबह करीब 10 बजे अस्पताल परिसर एक बार फिर एक महिला जवान के आंसुओं से भीग गया. पेट की गंभीर बीमारी से पीड़ित महिला होमगार्ड फुलकुमारी हेम्ब्रम बीच अस्पताल में फूट-फूटकर रो पड़ीं.
उन्होंने रूंधे गले से वहां खड़े लोगों और अधिकारियों से गुहार लगाई— “हमको पैसा दिला दीजिए… नहीं तो हम मर जाएंगे.” खुद बीमार होने के बावजूद दवा खरीदने के पैसे न होना, किसी भी सभ्य समाज और संवेदनशील व्यवस्था के लिए शर्मनाक है.
कर्ज के दलदल में धंसते जा रहे हैं जवान
जवानों का कहना है कि वेतन के अभाव में वे पूरी तरह कर्जदारों के रहमों-करम पर टिके हैं. राशन दुकान से लेकर बच्चों की स्कूल फीस और रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों के लिए उन्हें लोगों के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा है. जो जवान खुद बीमार हैं, वे बिना इलाज के ड्यूटी करने को मजबूर हैं.
‘आवंटन’ की फाइलों में अटका इंसानी दर्द
इस पूरे मामले पर एमजीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय कुमार ने पहली घटना के बाद पीड़िता को तात्कालिक व्यक्तिगत आर्थिक सहायता जरूर दी, लेकिन स्थायी समाधान अब भी सरकारी फाइलों में कैद है. उनका कहना है कि वेतन मद में राशि उपलब्ध कराने के लिए विभाग को पत्र भेजा जा चुका है, परंतु मुख्यालय से अब तक आवंटन (Budget Allocation) प्राप्त नहीं हुआ है.
सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र में बैठे अधिकारियों को इन जवानों के पेट की भूख और उनके बच्चों की सिसकियां सुनाई नहीं देतीं? क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? सुरक्षा व्यवस्था का दावा करने वाली सरकार को तुरंत दखल देकर इन 135 परिवारों को इस गहरे संकट से उबारना होगा, ताकि सुरक्षा में तैनात किसी और हाथ को अपनी ही जान लेने के लिए मजबूर न होना पड़े.
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