कोच्चि. केरल में न्याय प्रणाली और कानून के शासन को लेकर एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक घटनाक्रम सामने आया है। कोच्चि में हुई एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना, जिसमें 55 वर्षीय स्कूटर सवार जयबालाकृष्णन की जान चली गई थी, अब देश भर में चर्चा का विषय बन गई है। यह हादसा इसलिए ऐतिहासिक और गंभीर रूप ले चुका है क्योंकि इसमें कथित तौर पर एक न्यायिक अधिकारी (जज) के 17 वर्षीय नाबालिग बेटे की संलिप्तता सामने आई है, जिस पर मर्सिडीज-बेंज कार लापरवाही से चलाने का आरोप है।
शुरुआती दौर में इस मामले को दबाने और आरोपी को बचाने के लिए पुलिस महकमे पर गंभीर आरोप लगे थे। पीड़ित परिवार का यह कड़ा आरोप था कि पुलिस ने रसूख के दबाव में आकर न केवल शुरुआती एफआईआर में कमजोर धाराएं जोड़ीं, बल्कि आरोपी को रातों-रात जमानत दिलाने की जल्दबाजी भी की और सबूतों को मिटाने में मदद की।
हालांकि, भारी जनआक्रोश, मीडिया के दबाव और उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद राज्य सरकार और प्रशासन को झुकना पड़ा। गृह मंत्री रमेश चेन्नीथला ने विधानसभा में स्पष्ट किया कि कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति विशेष नहीं है, चाहे वह न्यायिक पद पर ही क्यों न हो। सरकार ने जांच में हुई गंभीर खामियों को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है।
इस ऐतिहासिक कदम के तहत, मोटर वाहन अधिनियम की धारा 199ए को एफआईआर में जोड़ा गया है, जो सीधे तौर पर वाहन के मालिक यानी जज को जिम्मेदार ठहराती है। इसके साथ ही, कर्तव्य में भारी लापरवाही और पक्षपात बरतने के आरोप में चार पुलिस अधिकारियों, सर्कल इंस्पेक्टर श्याम कुमार केएस, सब-इंस्पेक्टर विश्वजीत, ग्रेड सब-इंस्पेक्टर मनोज केटी और सिविल पुलिस अधिकारी अरुण जोशी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
यह घटना प्रशासनिक और न्यायिक जवाबदेही के इतिहास में एक कड़ा संदेश देती है कि कितनी भी बड़ी हस्ती क्यों न हो, कानून के हाथ हर आरोपी तक पहुंच सकते हैं। पुलिस अब अदालत से नाबालिग की जमानत रद्द करने की औपचारिक मांग भी कर रही है।


