रांची. झारखंड पुलिस मुख्यालय एक बार फिर प्रशासनिक फैसलों और विवादों के घेरे में आ गया है। इस बार विवाद का मुख्य कारण सहायक अवर निरीक्षक (ASI) की 24 दिसंबर 2025 को जारी छठी वरिष्ठता सूची है, जिसमें अचानक ‘रीडर संवर्ग’ के कर्मचारियों के नाम शामिल कर दिए गए हैं। इस निर्णय के बाद से वर्षों से अपनी पदोन्नति का इंतजार कर रहे मूल एएसआई कर्मियों में भारी असंतोष और आक्रोश देखने को मिल रहा है। पीड़ित पुलिसकर्मियों ने नियमों की अनदेखी का गंभीर आरोप लगाते हुए मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, साथ ही डीजीपी तदाशा मिश्रा से व्यक्तिगत हस्तक्षेप की अपील की है।
क्या है पूरा विवाद?
झारखंड पुलिस विभाग में एएसआई की वरिष्ठता सूची तय करने के लिए साल 2017 से अब तक कुल छह सूचियां प्रकाशित की जा चुकी हैं।
पूर्व की स्थिति: वर्ष 2017, 2020 और 2023 में दो-दो बार, तथा वर्ष 2025 में भी दो बार सूचियां जारी हुई थीं। 26 जून 2025 तक जारी शुरुआती पांचों सूचियों में रीडर संवर्ग के कर्मियों को शामिल नहीं किया गया था।
अचानक बदलाव: 24 दिसंबर 2025 को जारी छठी और अंतिम वरिष्ठता सूची में पहली बार रीडर संवर्ग के कर्मचारियों को एएसआई की सूची में स्थान दे दिया गया, जिससे पूरी पुरानी सीनियरिटी व्यवस्था प्रभावित हो गई।
स्वतंत्र कैडर और वरिष्ठता पर प्रभाव
आक्रोशित पुलिसकर्मियों का तर्क है कि विभागीय सेवा नियमों के अनुसार रीडर संवर्ग का कैडर सामान्य एएसआई कैडर से पूरी तरह स्वतंत्र और अलग होता है। ऐसे में यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि किस नियम के तहत रीडर संवर्ग के कर्मियों का विलय एएसआई की वरिष्ठता सूची में किया गया।
वर्तमान में रीडर संवर्ग में 100 से अधिक कर्मी कार्यरत हैं। इन्हें इस सूची में स्थान मिलने के कारण मूल एएसआई कैडर के अधिकारियों की रैंकिंग पीछे खिसक गई है, जिससे उनकी भावी पदोन्नति और करियर के अवसरों पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल और कानूनी विकल्पों की चेतावनी
पीड़ित अधिकारियों का मानना है कि पूर्व की पांच सूचियों में जो प्रावधान लागू नहीं थे, उन्हें छठी सूची में शामिल करके सीधे तौर पर रीडर संवर्ग को अनुचित लाभ पहुंचाया गया है। इस विसंगति के चलते महकमे के भीतर असंतोष लगातार गहराता जा रहा है। पीड़ित कर्मियों ने चेतावनी दी है कि यदि इस मनमाने और दोषपूर्ण निर्णय की समय रहते समीक्षा नहीं की गई, तो वे न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने को बाध्य होंगे।


