ड्रग्स की लत में डूबे युवा अपनी नशे की खुराक पूरी करने के लिए लूट और चोरी जैसे अपराधों को अंजाम दे रहे हैं, जिससे आम नागरिकों का जीना दूभर हो गया है. हाल ही में नशा विरोधी अभियान से जुड़े एक व्यक्ति की हत्या और पीड़ित परिवार को सुरक्षा न मिलना पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है.
जमशेदपुर. शहर इस समय बढ़ते अपराध, नशीले पदार्थों के कारोबार और सट्टेबाज़ी की गिरफ्त में छटपटा रहा है. यह अब केवल एक सामान्य कानून-व्यवस्था का संकट नहीं रह गया है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न बन चुका है. शहर की सड़कों पर दिन-दहाड़े हो रही छिनतई, चोरी, लोहा-तांबा तस्करी और अब हत्या जैसी हिंसक वारदातें इस बात की गवाही दे रही हैं कि अपराधियों के दिल से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है.
ड्रग्स की लत में डूबे युवा अपनी नशे की खुराक पूरी करने के लिए लूट और चोरी जैसे अपराधों को अंजाम दे रहे हैं, जिससे आम नागरिकों का जीना दूभर हो गया है. हाल ही में नशा विरोधी अभियान से जुड़े एक व्यक्ति की हत्या और पीड़ित परिवार को सुरक्षा न मिलना पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है.
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने शहर में फल-फूल रहे इस काले कारोबार पर सीधे तौर पर पुलिस और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर तीखे सवाल दागे हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि जब पुलिस ने शुरुआती दौर में ड्रग्स और सट्टेबाज़ी के सिंडिकेट पर शिकंजा कसा था, तब ऐसा लगा था कि गिरोह के सरगना तक आंच पहुंचेगी. लेकिन अचानक ही यह कार्रवाई ठंडे बस्ते में डाल दी गई.
विधायक का सवाल सीधे तौर पर शहर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) और पुलिस महकमे से है कि आखिर किस दवाब या इशारे पर यह कार्रवाई बीच में ही रोक दी गई? जब एसएसपी खुद कई कड़ियों और सुरागों के मिलने की बात स्वीकार कर चुके थे, तो मुख्य सरगनाओं को दबोचने से पहले पुलिस के कदम पीछे क्यों हटे? क्या पुलिस की इस रहस्यमयी चुप्पी के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संरक्षण काम कर रहा है?
यह पूरी स्थिति राज्य सरकार की नाकामी और उसकी नीयत पर भी बड़े सवाल खड़े करती है. सत्ता में बैठी सरकार और उसका गृह विभाग शहर को अपराध मुक्त बनाने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है. ऑनलाइन सट्टेबाज़ी और एआई-डिजिटल माध्यमों से युवाओं को कर्ज और बर्बादी के दलदल में धकेला जा रहा है, लेकिन साइबर पुलिस और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है.
जब तक सरकार और पुलिस की मिलीभगत या लापरवाही पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक यह नेटवर्क खत्म नहीं हो सकता. पुलिस जिस दिन ठान ले, उसी दिन यह धंधा बंद हो सकता है, लेकिन ऐसा न होना सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को उजागर करता है.



