नई दिल्ली/पटना. बिहार में लगातार बढ़ते सड़क हादसों और ‘गोल्डन आवर’ (दुर्घटना के बाद का पहला घंटा) में इलाज न मिलने से होने वाली मौतों को रोकने के लिए राज्य सरकार ने एक नई और जनकल्याणकारी पहल शुरू की है. इसके तहत आपातकालीन सेवा ‘डायल-112’ के पुलिसकर्मी अब सड़क दुर्घटना पीड़ितों को त्वरित सहायता देने के साथ-साथ केंद्र सरकार की पीएम राहत योजना (PM RAHAT) के तहत मुफ्त व कैशलेस इलाज मुहैया कराने वाले नजदीकी अस्पतालों की जानकारी देंगे.
योजना और सुविधाओं का विवरण
इस योजना के तहत सड़क दुर्घटना में घायल किसी भी व्यक्ति को दुर्घटना की तिथि से 7 दिनों तक ₹1.5 लाख तक के मुफ्त कैशलेस इलाज की सुविधा प्रदान की जाती है.
तत्काल भर्ती व स्थिरता का अधिकार: सामान्य मामलों में 24 घंटे और गंभीर (जीवन-रक्षक) मामलों में 48 घंटे तक मरीज को बिना किसी अग्रिम भुगतान के अस्पताल में ‘स्टेबलाइजेशन’ (स्थिति स्थिर करने का) इलाज दिया जाएगा.
अस्पतालों में कवरेज: आयुष्मान भारत योजना (AB PM-JAY) से सूचीबद्ध सभी अस्पतालों में इस योजना के तहत कैशलेस इलाज उपलब्ध है.
सरल प्रक्रिया: दुर्घटना की सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर अस्पताल में भर्ती होना अनिवार्य है.
कैसे काम करेगी पूरी प्रणाली (कार्यप्रणाली)?
आपातकालीन कॉल: दुर्घटना के बाद पीड़ित या कोई भी मददगार (‘राह-वीर’) तुरंत 112 नंबर पर कॉल करेगा.
लोकेशन और अस्पताल मार्गदर्शन: डायल-112 का कॉल सेंटर शिकायत दर्ज कर निकटतम सूचीबद्ध (Empanelled) अस्पताल का विवरण उपलब्ध कराएगा और एम्बुलेंस समन्वय स्थापित करेगा.
डिजिटल प्रमाणीकरण: मरीज के अस्पताल पहुंचने पर अस्पताल TMS 2.0 पोर्टल पर आईडी बनाकर पुलिस पोर्टल (eDAR) को भेजेगा. पुलिस द्वारा दुर्घटना का सत्यापन (Police Authentication) ऑनलाइन माध्यम से ही किया जाएगा.
भुगतान की व्यवस्था: इलाज का खर्च ‘मोटर वाहन दुर्घटना कोष’ (MVAF) से सीधे अस्पताल को ट्रांसफर किया जाएगा, जिससे मरीज या उसके परिजनों पर कोई वित्तीय दबाव नहीं आएगा.
जमीनी हकीकत का संशय, क्या वाकई लाभकारी सिद्ध होगी योजना
कागजी आंकड़ों और नीतिगत ढांचों में यह योजना बेहद जनउपयोगी दिखती है, लेकिन बिहार की मौजूदा व्यवस्था में इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
जागरूकता का अभाव: अधिकारियों के अनुसार, जागरूकता की कमी के चलते बिहार में अब तक बेहद कम लोग ही इस कैशलेस सुविधा का लाभ उठा पाए हैं.
अस्पतालों की हठधर्मिता: निजी और सूचीबद्ध अस्पताल अक्सर पुलिस केस और क्लेम रीइम्बर्समेंट (फंड मिलने) की कागजी जटिलताओं से बचने के लिए आपातकालीन मरीजों को टालने का प्रयास करते हैं.
ग्रामीण इलाकों में एम्बुलेंस और नेटवर्क की सुस्ती: बिहार के सुदूर ग्रामीण इलाकों में 112 की गाड़ियां या एम्बुलेंस ‘गोल्डन आवर’ में समय पर पहुंच पाएंगी या नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न है.
नौकरशाही का विलंब: पुलिस सत्यापन (Authentication) की प्रक्रिया अगर समयबद्ध नहीं रही, तो कागजी औपचारिकताओं के चलते गरीब परिवार को ही अंततः अस्पताल के चक्कर काटने पड़ सकते हैं.
बिहार सरकार और पुलिस प्रशासन की यह पहल निःसंदेह सराहनीय है. हालांकि, योजना का वास्तविक लाभ तभी मिल सकेगा जब अस्पतालों की जवाबदेही तय हो और डायल-112 का रिस्पॉन्स टाइम गांव से लेकर शहर तक वास्तविक रूप से तेज हो.


