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Home » स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली भेट चढ़ा: उम्रकैद काट रहे 82 वर्षीय बुजुर्ग कैदी की इलाज के दौरान मौत
झारखंड

स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली भेट चढ़ा: उम्रकैद काट रहे 82 वर्षीय बुजुर्ग कैदी की इलाज के दौरान मौत

Ocean News DeskBy Ocean News DeskOctober 25, 2026
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जमशेदपुर सदर अस्पताल (फाइल फोटो)
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उम्र के इस पड़ाव पर जहां व्यक्ति को विशेष शारीरिक देखभाल और निरंतर चिकित्सीय निगरानी की आवश्यकता होती है, वहां इस प्रकार की व्यवस्था का अभाव एक अमानवीय स्थिति को दर्शाता है।

जमशेदपुर/सरायकेला: झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था और जेल प्रशासन की लाचारी एक बार फिर कटघरे में है। परसुडीह स्थित सदर अस्पताल में इलाज के दौरान एक 82 वर्षीय बुजुर्ग कैदी की मौत हो गई, जो प्रशासनिक दावों और स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलती है। हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हाटगम्हरिया (पश्चिम सिंहभूम) निवासी जादव बिरूवा घाघीडीह सेंट्रल जेल में बंद थे। 25 अक्टूबर को अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उचित और समय पर मिलनी वाली उच्चस्तरीय चिकित्सा के अभाव में उन्होंने दम तोड़ दिया।

यह घटना राज्य के अस्पतालों और जेलों में बंद कैदियों के स्वास्थ्य अधिकारों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। एक 82 वर्षीय बुजुर्ग, जो पिछले दो दशकों से अधिक समय से सलाखों के पीछे था, उसकी चिकित्सीय देखरेख में इस तरह की लापरवाही सामने आना बेहद चिंताजनक है। जादव बिरूवा को वर्ष 2001 में एक हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

पहले उन्हें चाईबासा जेल में रखा गया और बाद में 2019 में घाघीडीह सेंट्रल जेल स्थानांतरित किया गया था। उम्र के इस पड़ाव पर जहां व्यक्ति को विशेष शारीरिक देखभाल और निरंतर चिकित्सीय निगरानी की आवश्यकता होती है, वहां इस प्रकार की व्यवस्था का अभाव एक अमानवीय स्थिति को दर्शाता है।

अक्सर देखा जाता है कि सरकारी अस्पतालों और जेलों की चिकित्सा इकाइयों के बीच समन्वय की कमी के कारण कैदियों को समय पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह या गंभीर स्थिति में तुरंत वेंटिलेटर जैसी उच्चस्तरीय सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। सदर अस्पतालों में बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं और डॉक्टरों की कमी के चलते कई बार गंभीर मरीजों को तड़पना पड़ता है, और इस बार इस व्यवस्था की कीमत एक बुजुर्ग कैदी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

सवाल यह उठता है कि क्या उम्रदराज और गंभीर रूप से बीमार कैदियों के लिए पैरोल या समय से पहले रिहाई की मानवीय नीतियों पर कड़ाई से अमल नहीं किया जाना चाहिए? जेलों में ओवरक्राउडिंग (कैदियों की अधिक संख्या) और स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति मिलकर ऐसी त्रासदियों को जन्म देती है। यदि समय रहते जादव बिरूवा को बेहतर चिकित्सा संस्थानों में शिफ्ट किया जाता, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी।

इस घटना के बाद अब पुलिस और प्रशासन द्वारा शव के पोस्टमार्टम व अन्य कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं, लेकिन यह प्रशासनिक खानापूर्ति उस बुजुर्ग की मौत के असल कारणों और सिस्टम की नाकामी को छिपा नहीं सकती। झारखंड सरकार और स्वास्थ्य विभाग को इस दिशा में गंभीर कदम उठाने की जरूरत है ताकि जेलों और अस्पतालों में लचर व्यवस्था के कारण किसी अन्य को अपनी जान न गंवानी पड़े।

Ghaghidih Central Jail Healthcare System Jamshedpur News Jharkhand News Prisoner Death
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