नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी उत्सव के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में देश और दुनिया के मौजूदा हालातों पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने पश्चिम देशों की संस्कृति और भारत को कमजोर करने की साजिशन रची जा रही चालों पर कड़ी चेतावनी दी। भागवत ने साफ शब्दों में कहा कि लोकतंत्र में विरोध के नाम पर राजनीति से प्रेरित और अराजक आंदोलन चलाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है। उन्होंने फ्रांस और अल्बानिया जैसी घटनाओं का हवाला देते हुए देशवासियों को आगाह किया कि भारत को अस्थिर करने के लिए वैसी ही साजिशें यहां भी रची जा रही हैं।
पश्चिम की भौतिकवादी सोच से दुनिया में संकट
आरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन में कहा कि आज पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर आकर्षित हो रहा है। इसका कारण यह है कि पश्चिम देशों की भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और बेलगाम उपभोग पर आधारित जीवनशैली पूरी तरह एकांगी साबित हुई है। भले ही वे देश आर्थिक रूप से बेहद समृद्ध हों, लेकिन वे परिवार के विघटन, नई पीढ़ी में गिरते नैतिक मूल्यों, विकास और पर्यावरण के बीच असंतुलन जैसी गंभीर समस्याओं से घिरे हुए हैं। इन सवालों के जवाब उनके पास नहीं हैं, जबकि भारत की सनातन संस्कृति और सामायिक दृष्टिकोण के पास इन सबका समाधान मौजूद है।
‘राजनीति से प्रेरित आंदोलन और सस्ती लोकप्रियता का खेल’
दुनिया भर में हो रहे हिंसक प्रदर्शनों और आंदोलनों का जिक्र करते हुए मोहन भागवत ने कड़े शब्दों में कहा कि पश्चिम से आने वाली इस विध्वंसक आंधी से देश को बचकर रहना होगा। लोकतंत्र में असंतोष या आंदोलन स्वाभाविक हो सकते हैं, लेकिन उनका मूल उद्देश्य हमेशा समाधान तलाशना होना चाहिए, न कि अराजकता फैलाना।
उन्होंने तीखा आरोप लगाया कि कुछ लोग और ताकतें ‘सस्ती लोकप्रियता’ हासिल करने के लिए समाज को उकसाने का काम कर रही हैं। केवल सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था नहीं बदलती; इतिहास गवाह है कि जो लोग अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते हैं, वे हमेशा ऐसे ही मोहरों का इस्तेमाल करते हैं। संघ प्रमुख ने चेतावनी दी कि भारत का बढ़ता वैश्विक कद और उदय ऐसी तमाम भारत-विरोधी ताकतों की साजिशों पर अपने आप विराम लगा देगा, यही वजह है कि देश को तोड़ने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं।
‘हिंदुओं और संघ को तोड़ने की शैतानी ताकतें सक्रिय’
मोहन भागवत ने दो टूक कहा कि देश विरोधी और विघटनकारी ‘शैतानी ताकतें’ लगातार इस ताक में रहती हैं कि कैसे भारत, हिंदुओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को कमजोर किया जाए। इन ताकतों को देश के भीतर ही सत्ता की लालसा और विवेकहीनता से भरे कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं का साथ मिल जाता है, जो अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए देशहित को ताक पर रख देते हैं। उन्होंने संत रविदास के सामाजिक समरसता और ‘स्वधर्म निष्ठा’ के संदेश को याद दिलाते हुए कहा कि अतीत में जब-जब देश विभाजित हुआ, तब-तब हम कमजोर हुए। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत अपनी भावनात्मक एकता और भारतीय राष्ट्रीयता की भावना को सर्वोपरि रखने की है।
‘भारत के साथ हमारा रिश्ता बिना शर्त का’
देशवासियों के अपनेपन का जिक्र करते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा कि ‘हम भारत के साथ एक हैं और हमारी यह एकता दिल से जुड़ी है, यह कोई व्यावसायिक सौदा या कॉन्ट्रैक्ट नहीं है।’ यह भावना इस शर्त पर आधारित नहीं है कि देश हमें क्या देता है, बल्कि इसके विपरीत, भारत हमें कुछ दे या न दे, हमारा सर्वस्व इसी राष्ट्र को समर्पित है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एक मजबूत और संगठित हिंदू समाज के निर्माण का उद्देश्य किसी भी अन्य धर्म या वर्ग का विरोध करना नहीं है, बल्कि देश की नैतिक अखंडता और साझी सांस्कृतिक विरासत को अधिक सशक्त बनाना है। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने कैप्टन स्मित मच्छार के साहसिक और स्वाभाविक कृत्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि कठिन वक्त में भारतीय संस्कार और परंपराएं ही व्यक्ति को सही मार्ग दिखाती हैं।


