देश की ऋण संस्कृति और वित्तीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. किस प्रकार बड़े उद्योगपति विशालकाय कर्ज लेते हैं, व्यक्तिगत गारंटियां देते हैं और फिर कानूनी और दिवालिया तंत्र की जटिलताओं और लूपहोल का लाभ उठाकर हजारों करोड़ के कर्जों को महज चंद रुपयों में चुकता करवा लेते हैं.
नई दिल्ली. राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) का जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के कर्ज निपटारे से जुड़ा फैसला इन दिनों वित्तीय और कानूनी हलकों में व्यापक बहस का विषय बन गया है. इस हालिया फैसले के तहत न्यायाधिकरण ने सुभाष चंद्रा पर बकाया 22,006.57 करोड़ रुपये से अधिक के भारी-भरकम दावों का निपटारा महज 6.5 करोड़ रुपये में करने की अनुमति दे दी है.
इसके परिणामस्वरूप, विभिन्न कर्जदाताओं को उनकी बकाया मूल रकम का महज 0.03% हिस्सा ही मिल पाएगा. इस फैसले के बाद से सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं और मीम्स की बाढ़ आ गई है, जहां आम लोग इसे किसी ‘वित्तीय चमत्कार’ या कानून के साथ मजाक की तरह पेश कर रहे हैं.
इस व्यवस्था की शुरुआत साल 2024 में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की याचिका पर दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के साथ हुई थी. सुभाष चंद्रा ने एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कंपनियों के लिए लिए गए कर्जों पर व्यक्तिगत गारंटी दी थी, जिसके बाद अन्य कर्जदाताओं ने भी अपने 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के दावे पेश किए थे.
हालांकि, इस भारी-भरकम कटौती वाली पुनर्भुगतान योजना को करीब 80.81% वोटिंग शेयर का समर्थन मिल गया, जिसे आधार बनाते हुए NCLT बहुसंख्यक कर्जदाताओं के व्यावसायिक फैसले का हवाला दिया और आपत्तियों को खारिज कर दिया.
यह पूरा प्रकरण देश के बड़े कॉरपोरेट्स और पूंजीपतियों द्वारा लोन प्रणाली के साथ की जाने वाली कानूनी चालबाजियों और कारगुजारियों को भी गहराई से उजागर करता है. आलोचकों और विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामले देश की ऋण संस्कृति और वित्तीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. किस प्रकार बड़े उद्योगपति विशालकाय कर्ज लेते हैं, व्यक्तिगत गारंटियां देते हैं और फिर कानूनी और दिवालिया तंत्र की जटिलताओं और लूपहोल का लाभ उठाकर हजारों करोड़ के कर्जों को महज चंद रुपयों में चुकता करवा लेते हैं.
यह देश के बैंकिंग ढांचे के लिए एक चिंताजनक विषय बन चुका है. आम जनता और छोटे कर्जदारों के लिए जहां एक-एक पाई चुकाना अनिवार्य होता है, वहीं इस तरह के कॉरपोरेट समझौते पूंजीपतियों को भारी कानूनी और वित्तीय राहत दिला जाते हैं.
इस पूरी प्रक्रिया के खिलाफ एचडीएफसी बैंक अब कड़ा रुख अपनाने की तैयारी कर रहा है. बैंक का इस मामले में कुल स्वीकृत दावा 680 करोड़ रुपये (कुल रकम का 3.2%) था, जो उसे एचडीएफसी लिमिटेड के साथ विलय से पहले विरासत में मिला था.
बैंक ने स्पष्ट किया है कि उसने इस समझौते का विरोध करते हुए प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था. अब बैंक इस न्याय प्रणाली की सीमाओं को चुनौती देते हुए एनसीएलएटी में अपील करने की पुख्ता संभावना तलाश रहा है, ताकि इस विवादास्पद फैसले पर फिर से विचार किया जा सके.




