नई दिल्ली. मंगला एक्सप्रेस (12618) में दिल्ली से केरल लौट रहे 30 स्कूली बच्चों की पैंट्रीकार का खाना खाने से अचानक तबीयत बिगड़ गई. उल्टी, दस्त और तेज बुखार से पीड़ित इन बच्चों को मध्य प्रदेश के खंडवा स्टेशन पर आपातकालीन चिकित्सा मुहैया करानी पड़ी.
यह घटना सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे और आईआरसीटीसी (IRCTC) की बदहाल खान-पान प्रणाली और लचर निगरानी तंत्र की एक और कड़वी सच्चाई है.
आईआरसीटीसी का दावा रहता है कि ट्रेनों में यात्रियों को स्वच्छ, ताजा और गुणवत्तापूर्ण भोजन परोसा जाता है. लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि पैंट्रीकारों में स्वच्छता के मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं. जब भी कोई ऐसी बड़ी घटना सामने आती है, तो रेलवे का पारंपरिक रवैया बेहद निराशाजनक रहता है.,
खाना खाने से 30 बच्चे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि मौके पर भोजन के जरूरी सैंपल तक नहीं लिए गए. यह सीधे तौर पर लापरवाही को छिपाने और गुणवत्ता जांच प्रक्रिया से पल्ला झाड़ने जैसा है.
सबसे बड़ा सवाल रेलवे की कार्यशैली और दंड प्रक्रिया पर खड़ा होता है. जब भी ट्रेनों में खराब खाना परोसने या बासी सामग्री आपूर्ति की शिकायतें साबित होती हैं, तब रेलवे ठेकेदारों या कैटरिंग वेंडरों पर कुछ हजार या लाख रुपये का जुर्माना (Fine) ठोक कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है.
- रेलवे के लिए कमाई का जरिया: यह जुर्माना व्यवस्था रेलवे के लिए एक तरह से अतिरिक्त राजस्व और कमाई का जरिया बन चुकी है.
- वेंडरों की मनमानी: वेंडर आसानी से जुर्माना भरकर दोबारा वही घटिया सामग्री परोसना जारी रखते हैं, क्योंकि उनके पास गुणवत्ता सुधारने की कोई ठोस जवाबदेही नहीं होती.
- यात्रियों का नुकसान: इस पूरी प्रक्रिया में पिसता सिर्फ आम यात्री है. पैसे पूरे चुकाने के बाद भी यात्रियों को ज़हरीला भोजन, शारीरिक पीड़ा, मानसिक तनाव और हेल्थ इमरजेंसी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
इसके अलावा, ट्रेनों के आरक्षित डिब्बों में अवैध वेंडरों का बेरोक-टोक आना-जाना और घटिया सामान बेचना यह साबित करता है कि ट्रेन में मौजूद रेलवे अधिकारियों और आईआरसीटीसी के इंस्पेक्टरों की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है.
जब तक केवल जुर्माना वसूलने की नीति को छोड़कर दोषी कैटरिंग ठेकेदारों के लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द नहीं किए जाएंगे और जिम्मेदारों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यात्री इसी तरह अपनी सेहत और जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर रहेंगे.




