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Home » JAMSHEDPUR : 24 दिन बाद भी सदर अस्पताल के नए उपाधीक्षक को नहीं मिला डीडीओ पावर
झारखंड

JAMSHEDPUR : 24 दिन बाद भी सदर अस्पताल के नए उपाधीक्षक को नहीं मिला डीडीओ पावर

Ocean News DeskBy Ocean News DeskAugust 26, 2026
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जमशेदपुर सदर अस्पताल (फाइल फोटो)
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  • 8 माह तक उपाधीक्षक का प्रभार संभालने वाले भुवनेश्वर शाह को भी नहीं मिला था DDO का प्रभार 

जमशेदपुर. कोल्हान के प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शुमार जमशेदपुर सदर अस्पताल इन दिनों प्रशासनिक खींचतान और गंभीर विभागीय लापरवाही का अड्डा बना हुआ है. अस्पताल में इलाज कराने आने वाले गरीब और असहाय मरीजों की सुविधा के नाम पर दावे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. स्वास्थ्य महकमे की अंदरूनी सुस्ती का आलम यह है कि नए अस्पताल उपाधीक्षक की नियुक्ति के 24 दिन बीत जाने के बावजूद उन्हें अब तक वित्तीय अधिकार (डीडीओ पावर) हस्तांतरित नहीं किए गए हैं.

दिलचस्प बात ये है की इससे पहले लगभग 8 माह तक उपाधीक्षक का प्रभार संभालने वाले भुवनेश्वर शाह को DDO का प्रभार नहीं मिल सका था. ये प्रभार अभी सिविल सर्जन डॉ साहिर पाल ने अपने पास ही रखा है.

विभागीय उदासीनता का सीधा असर अस्पताल के दैनिक संचालन और मरीजों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं पर पड़ रहा है. इस पूरे घटनाक्रम में जिला स्वास्थ्य विभाग के सर्वोच्च पद पर बैठे सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल की कार्यशैली और चुप्पी गंभीर सवाल खड़े कर रही है.

  • प्रशासनिक शिथिलता: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के संकल्पों (पत्र संख्या 5/पी0 19/2024-601(5)) और झारखंड कोषागार संहिता-2016 के स्पष्ट प्रावधानों के तहत सदर अस्पताल के उपाधीक्षक ही वित्तीय जिम्मेदारियों के मुख्य उत्तराधिकारी होते हैं. इसके बावजूद वित्तीय पावर हस्तांतरित न करना सिविल सर्जन की प्रशासनिक नीयत और कार्यकुशलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है.
  • शक्तियों का केंद्रीकरण: वित्तीय अधिकार और प्रशासनिक जिम्मेदारी दो अलग-अलग स्तरों पर बंटे होने के कारण पूरी व्यवस्था पंगु हो चुकी है. क्या सिविल सर्जन वित्तीय शक्तियों का मोह छोड़ना नहीं चाहते, या फिर यह विभाग की घोर अनदेखी का नतीजा है?
  • स्वास्थ्य विभाग का मौन चिंतनशील: 31 जुलाई को डॉ. कमलेश प्रसाद ने अस्पताल के नए उपाधीक्षक का पदभार संभाला था. लेकिन लगभग एक महीना बीतने को है और फाइलें अभी भी फाइलों में ही दबी हैं. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य सचिव और स्थानीय विधायक तक को टैग कर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन जिला स्तर पर कोई हलचल नहीं दिख रही.

मरीजों की जान से खिलवाड़ और ठप होती व्यवस्थाएं

वित्तीय अधिकार न मिलने के कारण सदर अस्पताल में दवाइयों की तत्काल खरीद, सर्जिकल उपकरणों की आपूर्ति, मेडिकल उपकरणों की मरम्मत और अस्पतालों के रखरखाव से जुड़े जरूरी फैसले अटके पड़े हैं. इसके अलावा मुख्यमंत्री अस्पताल संचालन योजना, आयुष्मान भारत, जननी सुरक्षा योजना और एनएचएम (NHM) फंड के सुचारू उपयोग व हिसाब-किताब पर भी ब्रेक लग गया है.

नतीजतन, दूर-दराज से आने वाले मरीजों को जांच और दवाओं के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है. कागजी प्रक्रियाओं और प्रशासनिक खींचतान की इस भेंट में पिस रही है आम जनता, जिसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. यदि समय रहते सिविल सर्जन और उच्च अधिकारियों ने इस व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया, तो सदर अस्पताल की बची-कुची व्यवस्था भी पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी.

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