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Home » बचपन पर मंडराता डिजिटल संकट, माता-पिता की जगह मोबाइल ले रहा, यह बहुत बड़ी आपदा है : सुप्रीम कोर्ट
ओसियन स्पेशल

बचपन पर मंडराता डिजिटल संकट, माता-पिता की जगह मोबाइल ले रहा, यह बहुत बड़ी आपदा है : सुप्रीम कोर्ट

SHOBHA SINGHBy SHOBHA SINGHJuly 24, 2026
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सांकेतिक तस्वीर
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नई दिल्ली.  देश में संयुक्त परिवार (Joint Family) प्रणाली के लगातार पतन और बच्चों को माता-पिता के समय की बजाय स्मार्टफोन व गैजेट्स थमाने के चलन पर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत गंभीर चिंता जताई है. शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि बच्चों की परवरिश में माता-पिता का स्थान गैजेट्स ले लेंगे, तो यह आने वाले समय में समाज के लिए एक भयानक आपदा साबित होगी.

पति-पत्नी की हत्या के मामलों की सुनवाई के दौरान टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ हाल ही में सामने आए कुछ सनसनीखेज मामलों, जिनमें सोनम रघुवंशी से जुड़े आपराधिक प्रकरण भी शामिल हैं, का विश्लेषण कर रही थी. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह बदलते आधुनिक समाज का एक बेहद चिंताजनक और कड़वा सच है.

अदालत ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी पहले के मुकाबले अधिक समझदार और जानकार अवश्य है, लेकिन उनमें जीवन के गंभीर दबाव और मानसिक तनाव को झेलने की क्षमता लगातार कम होती जा रही है. इसके साथ ही, लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और व्हाट्सएप पर आने वाले फॉरवर्डेड संदेशों को ही अंतिम सत्य मानकर बिना सोचे-समझे भरोसा करने लगे हैं, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है.

“खुशी भौतिक चीजों से नहीं, मानवीय रिश्तों से मिलती है”

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुंदरेश ने अपना एक निजी संस्मरण साझा करते हुए बताया कि हाल ही में वे एक रेस्तरां में गए थे, जहां उन्होंने देखा कि एक परिवार ने छोटे से बच्चे को खाने के दौरान शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए उसके हाथ में मोबाइल फोन थमा दिया था.

इस घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “यदि माता-पिता की जगह गैजेट्स ले लेंगी, तो यह एक बड़ी आपदा होगी. संयुक्त परिवार एक अमूल्य धरोहर और संपत्ति की तरह हैं, जिसे आज के लोग समझ नहीं पा रहे हैं. जीवन की वास्तविक खुशी किसी भौतिक वस्तु या स्क्रीन से नहीं, बल्कि मजबूत मानवीय बंधनों और पारिवारिक रिश्तों से मिलती है.” कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम धीरे-धीरे इंसानों से मशीन बनते जा रहे हैं.

सॉलिसिटर जनरल ने भी जताई सहमति

अदालत की इस चिंता पर अपनी सहमति जताते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी माना कि यह आज के समय की एक विकराल सामाजिक समस्या बन चुकी है. उन्होंने कहा कि मानवीय संबंधों में आपसी विश्वास कम हो रहा है और समाज में सहिष्णुता (टॉलरेंस) की भारी कमी देखने को मिल रही है.

कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी वर्तमान अभिभावकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है. यदि समय रहते बच्चों की परवरिश के तौर-तरीकों में बदलाव नहीं किया गया, तो भविष्य की पीढ़ी पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों से पूरी तरह कट जाएगी.

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मास कम्युनिकेशन की पृष्ठभूमि, डिजिटल मीडिया में गहराई से रुचि रखने वाली शोभा सिंह हिंदी न्यूज राइटर और OCEANPOST.IN की सब-एडिटर हैं. देश-दुनिया की हलचलों, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय खबरों को शब्दों के सही चयन और बेहतरीन संपादन (Editing) के जरिए पाठकों तक आसान भाषा में पहुंचा रहीं हैं.

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