- पार्लियामेंट्री कमेटी का नए कानून पर अड़ंगा, 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर दी गई सिफारिशों ने नई बहस को दिया जन्म
नई दिल्ली. हाल ही में संसद की संयुक्त समिति (JPC) द्वारा 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर दी गई सिफारिशों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है. मूल विधेयक में प्रावधान था कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आरोपों में 30 दिनों से अधिक समय तक जेल में रहता है, तो उसे 31वें दिन अनिवार्य रूप से अपना पद छोड़ना होगा.
लेकिन संसदीय समिति ने इस कड़े प्रावधान को बदलते हुए सिफारिश की है कि नेताओं को पद से हटाने के बजाय केवल निलंबित (Suspend) किया जाना चाहिए. आम जनता के नज़रिए से देखें तो यह बदलाव राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के प्रयासों पर एक बड़ा झटका महसूस होता है.
कानून में बदलाव और जनता की कसौटी
समिति ने अपनी दलील में कहा है कि यदि अदालत से कोई नेता बरी हो जाता है, तो उसका निलंबन स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए ताकि उसकी बहाली हो सके. तकनीकी और कानूनी रूप से यह सही लग सकता है, लेकिन भारतीय न्यायिक प्रणाली में मुकदमों के निपटारे में लगने वाले सालों-साल के समय को देखते हुए जनता इसे एक ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में देख रही है.
गंभीर अपराधों की परिभाषा को भी बदलकर केवल उन्हीं मामलों तक सीमित करने का सुझाव दिया गया है जिनमें 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है. जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे नीति-निर्माताओं के लिए कड़े नियम लागू नहीं होने चाहिए?
आम जनता की भावनाएं और आक्रोश
कानून की दोहरी व्यवस्था: एक आम नागरिक मामूली आरोपों में भी महीनों जेल में काट देता है और उसकी नौकरी तथा सामाजिक प्रतिष्ठा तुरंत खत्म हो जाती है. ऐसे में नेताओं के लिए “इस्तीफा नहीं, सिर्फ सस्पेंशन” का नियम जनता को न्याय के सिद्धांतों के विपरीत लगता है.
नैतिकता पर कानूनी दांवपेंच का हावी होना: भारतीय राजनीति में शुचिता और नैतिकता की मांग हमेशा से रही है. जेल से सरकार चलाने या सिर्फ कागजों पर सस्पेंड रहने की व्यवस्था लोकतंत्र की गरिमा को ठेस पहुंचाती है.
अस्थिरता का डर बनाम जवाबदेही: विपक्ष ने जहां मूल बिल को सरकारों को अस्थिर करने का हथियार बताया था, वहीं आम जनता का मानना है कि जवाबदेही और पारदर्शिता किसी भी राजनीतिक सुरक्षा से ऊपर होनी चाहिए.
सबके लिए समान अधिकार और समान कानून क्यों नहीं
जनता की नज़र में लोकतंत्र का मतलब है सबके लिए समान अधिकार और समान कानून. यदि शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे लोग गंभीर आरोपों के बाद भी तकनीकी बारीकियों का सहारा लेकर अपनी कुर्सी सुरक्षित रखेंगे, तो इससे न्याय प्रणाली पर आम आदमी का भरोसा डगमगा सकता है.
विशेष या त्वरित अदालतों (Fast Track Courts) के गठन का सुझाव स्वागत योग्य है, लेकिन जब तक नेताओं के लिए कड़े और जवाबदेह कानून नहीं बनेंगे, तब तक राजनीति में सुधार का सपना अधूरा ही रहेगा.




