रांची. रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में सेवानिवृत्त चिकित्सकों की अनुबंध पर नियुक्ति को लेकर व्यवस्था का एक बेहद विरोधाभासी और चौंकाने वाला चेहरा सामने आया है। एक तरफ जहां प्रशासनिक गलियारों में नजदीकियों और चुनिंदा पदों पर नियमों को ताक पर रखकर तुरंत लाभ पहुंचा दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ आम मरीजों के बेहतर इलाज से जुड़े बेहद अहम फैसलों को लाल फीताशाही और नियमों के नाम पर लटका दिया जाता है। इस पूरे प्रकरण ने संस्थान के संचालन के साथ-साथ इस पर नियंत्रण रखने वाली राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और मंशा पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
पूर्व निदेशक को मिला था विशेष लाभ
इस दोहरे रवैये की सबसे बड़ी मिसाल पूर्व निदेशक डॉ. डीके सिन्हा का मामला है। उन्हें सेवानिवृत्ति के ठीक अगले ही दिन दोबारा निदेशक पद का प्रभार सौंप दिया गया था। प्रशासनिक फेरबदल और उच्च स्तर पर निर्णयों की ऐसी तत्परता यह बताने के लिए काफी है कि जब सरकार या प्रशासन किसी को उपकृत करना चाहे, तो तमाम नियम और प्रक्रियाएं पलक झपकते ही अनुकूल हो जाती हैं।
मरीजों के हितों की अनदेखी और अटकी फाइलें
इसके विपरीत, आम जनता और गंभीर रोगियों के स्वास्थ्य हितों से जुड़े फैसलों के साथ पूरी तरह उदासीनता बरती जा रही है। रिम्स शासी परिषद की बैठक में यह स्पष्ट निर्णय लिया गया था कि संस्थान में मरीजों को विश्वस्तरीय इलाज मुहैया कराने के लिए दो अनुभवी और वरिष्ठ चिकित्सकों, न्यूरोसर्जरी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सीबी सहाय (अक्टूबर 2023 में सेवानिवृत्त) और मेडिसिन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. विद्यापति (अगस्त 2024 में सेवानिवृत्त) को अनुबंध पर सेवा विस्तार दिया जाए।
परिषद ने माना था कि इन दोनों डॉक्टरों के लंबे अनुभव का लाभ रिम्स के मरीजों को मिलेगा। इसके बावजूद, यह प्रस्ताव कागजों से बाहर नहीं निकल पाया है।
सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल
अब सबसे बड़ा और गंभीर सवाल राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर उठता है:
नियमों का बहाना क्यों? जब एक उच्च पदस्थ अधिकारी को रिटायरमेंट के तुरंत बाद पद पर बनाए रखने के लिए प्रशासनिक और कानूनी रास्ते आसानी से निकाल लिए जाते हैं, तो क्या वही सरकार जनता का इलाज करने वाले वरिष्ठ और विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए कोई स्पष्ट नियमावली या मार्ग नहीं बना सकती?
दोहरे मापदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं? क्या सरकार की प्राथमिकताएं आम मरीजों के स्वास्थ्य और अस्पताल की चिकित्सा गुणवत्ता से ज्यादा राजनीतिक या प्रशासनिक नफे-नुकसान तय करती हैं?
जिम्मेदार कौन? शासी परिषद के फैसलों और सरकार के मौखिक आश्वासनों के बावजूद यदि महीनों और वर्षों तक फाइलें अटकी रहती हैं, तो इसके लिए जवाबदेह कौन है?
रिम्स जैसे बड़े संस्थान में यदि स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाना है, तो सरकार को अपनी इस दोहरी नीति और उदासीनता को त्यागना होगा। अनुभवी चिकित्सकों की नियुक्ति के रास्ते में आ रही तकनीकी बाधाओं को दूर करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, ताकि आम और गरीब मरीजों को बेहतर चिकित्सा का लाभ मिल सके।


