नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण के दायरे को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने दोहराया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) या निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता का वेतन या आय अपने आप में किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर के दायरे में लाकर आरक्षण से बाहर करने का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आय के साथ-साथ माता-पिता के पद की स्थिति, श्रेणी और अन्य निर्धारित मानदंडों को भी कसौटी पर कसा जाना चाहिए।
केंद्र सरकार की मांग खारिज, समय सीमा बढ़ाई
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 11 मार्च को आए इस फैसले को आगे की तिथि से लागू करने का अनुरोध किया था। सरकार का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अदालत को यह शक्ति प्राप्त है कि वह फैसलों को भविष्य की तारीख से प्रभावी करे, ताकि पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं या उन कर्मचारियों पर असर न पड़े जो इस मुकदमे में पक्षकार नहीं थे। हालांकि, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि इस फैसले के क्रियान्वयन को टालने का कोई ठोस या न्यायसंगत आधार नहीं है। इसके साथ ही, अदालत ने फैसले को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को दो महीने का अतिरिक्त समय प्रदान किया है।
न्यायालय के फैसले के मुख्य बिंदु
व्यक्तिगत मामलों पर लागू: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला मुख्य रूप से अदालत के समक्ष आए पक्षकारों के अधिकारों को निर्धारित करता है। जो अभ्यर्थी ओबीसी गैर-क्रीमी लेयर श्रेणी में आते हैं, वे आरक्षण के लाभ के साथ-साथ अपनी चयन प्रक्रियाओं में पदस्थापन और पद आवंटन के हकदार हैं।
वरिष्ठता और पुरानी नियुक्तियां सुरक्षित: अदालत ने भरोसा दिलाया कि इस फैसले के लागू होने से किसी अन्य व्यक्ति की वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी और न ही पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों या चयन प्रक्रियाओं को दोबारा खोलने की आवश्यकता पड़ेगी।
अन्य लंबित मामलों की स्थिति: जिन अभ्यर्थियों के मामले देश के किसी अन्य न्यायालय, न्यायाधिकरण या सक्षम मंच पर लंबित हैं, संबंधित निकाय उनके दावों पर इस फैसले के सिद्धांतों और कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर निर्णय ले सकते हैं।
नीति निर्माण के लिए सरकार स्वतंत्र
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार संविधान और अदालत द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के दायरे में रहकर आरक्षण तथा क्रीमी लेयर से जुड़े नियम बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि पदों के बीच समकक्षता निर्धारित करने या पक्षों से परामर्श के लिए कार्यपालिका और विधायिका के कार्यक्षेत्र में समय-सीमा तय करना उचित नहीं है। इस प्रकार, यह निर्णय उन तमाम युवाओं के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है जो केवल माता-पिता के वेतन के आधार पर आरक्षण के लाभ से वंचित हो जाते थे।


