रांची.
झारखंड में पुलिस थानों के भीतर मानवाधिकारों के हनन और कथित ‘थर्ड डिग्री’ टॉर्चर के मामलों को लेकर न्यायपालिका ने अब पूरी तरह सख्ती बरतनी शुरू कर दी है. राज्य के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने की प्रक्रिया में हो रही अत्यधिक देरी पर झारखंड हाईकोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है.
अदालत ने साफ कर दिया है कि पुलिस थानों को किसी भी सूरत में कानून के दायरे से बाहर नहीं रहने दिया जाएगा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए थानों की निगरानी प्रणाली को अब पूरी तरह पारदर्शी और चाक-चौबंद बनाना होगा.
तरूण महतो प्रकरण से खुला था राज़
यह पूरा मामला 19 नवंबर 2025 की एक खौफनाक रात से जुड़ा है, जब इचागढ़ पुलिस ने झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के प्रत्याशी तरुण महतो को हिरासत में लिया था. आरोप था कि पुलिस ने थाने के एक बंद कमरे में उन्हें अमानवीय यातनाएं दीं. इस गंभीर घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए थे.
जब स्थानीय स्तर पर न्याय की उम्मीद धूमिल दिखने लगी, तब पीड़ित की पत्नी ने सीधे झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई. अदालत ने इस पत्र को स्वतः संज्ञान में लेते हुए राज्य में पुलिस थानों की कार्यशैली की समीक्षा शुरू की है.
थानों की निगरानी सख्त करने के लिए जरूरी कदम
थानों के अंदर होने वाले अपराधों और पुलिस उत्पीड़न पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए निम्नलिखित ठोस उपायों को लागू करना अत्यंत आवश्यक हो गया है:
- पूर्ण सीसीटीवी कवरेज: सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशानुसार, प्रत्येक थाने के हर कोने, जैसे मुख्य द्वार, हाजत (lockup), गलियारे और जांच अधिकारियों के कमरों—में नाइट विजन और ऑडियो रिकॉर्डिंग युक्त सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने चाहिए, ताकि कोई भी गतिविधि पुलिस की नजरों से छिप न सके.
- केंद्रीय व स्वतंत्र निगरानी सेल: थानों में लगे कैमरों की फुटेज केवल स्थानीय थाना प्रभारियों के भरोसे न छोड़कर जिला मुख्यालय या राज्य स्तर पर स्थापित एक स्वतंत्र मॉनिटरिंग सेल से जोड़ी जानी चाहिए, ताकि साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो सके.
- फुटेज का सुरक्षित डेटा बैंक: सीसीटीवी फुटेज को कम से कम एक साल तक सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षित डिजिटल स्टोरेज की व्यवस्था हो, ताकि पीड़ित या उनके परिजन जरूरत पड़ने पर अदालत के माध्यम से फुटेज हासिल कर सकें.
सख्त जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई: यदि किसी थाने में हिरासत के दौरान हिंसा या मानवाधिकार हनन का मामला सामने आता है, तो वहां के थाना प्रभारी और संबंधित पुलिसकर्मियों पर बिना किसी प्रशासनिक देरी के सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए.
सरकार और पुलिस प्रशासन पर शिकंजा
मामले की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की खंडपीठ के समक्ष महाधिवक्ता ने बताया कि थानों में कैमरे लगाने के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. निविदादाताओं को 29 अक्टूबर तक आवेदन जमा करने हैं, जबकि 30 नवंबर को टेंडर की बिड खोली जाएगी.
इसके बाद सरकार को अपनी विस्तृत प्रगति रिपोर्ट अदालत में सौंपनी होगी. हालांकि, अदालत ने फिलहाल डीजीपी को तुरंत पेशी से राहत दी है, लेकिन उन्हें 4 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का कड़ा निर्देश दिया है.
यह पूरा प्रकरण इस बात का स्पष्ट संदेश है कि खाकी की आड़ में कानून की धज्जियां उड़ाने वालों को अब अदालत की कड़ी निगरानी और जवाबदेही के कड़े दायरे से गुजरना ही होगा.



