लंदन. लंदन में आयोजित आर्थिक अपराध पर 43वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने वित्तीय अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग पर गंभीर चिंता जताई है. उन्होंने बताया कि दुनिया भर में अवैध रूप से हेर-फेर की गई राशि का केवल एक प्रतिशत (हर 100 रुपये में से 1 रुपया) ही कानूनी एजेंसियां वापस हासिल कर पाती हैं. बाकी की 99 प्रतिशत संपत्ति केवल भाषणों, आधिकारिक रिपोर्ट्स और फाइलों तक ही सीमित रह जाती है.
मनी लॉन्ड्रिंग का विशाल दायरा और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां
सीजेआई ने वित्तीय अपराधों के व्यापक पैमाने को रेखांकित करते हुए कहा कि हर साल दुनिया भर में जितनी रकम की मनी लॉन्ड्रिंग होती है, वह इतनी विशाल है कि उससे पृथ्वी के प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक साधारण लैपटॉप खरीदा जा सकता है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि अपराधियों की चालाकी और भगोड़ों को वापस लाने के लिए वैश्विक स्तर पर सहयोग की कमी इस नाकामी की मुख्य वजह है. अवैध धन और आर्थिक अपराध जिस गति से सीमाओं के पार फैलते हैं, अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों की रफ्तार उसकी तुलना में काफी धीमी है. यही कारण है कि कोई भी देश, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली या संसाधनों से संपन्न क्यों न हो, अकेले इस समस्या से नहीं निपट सकता.
कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ का उल्लेख
अपने संबोधन में मुख्य न्यायाधीश ने कौटिल्य के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ का संदर्भ दिया. उन्होंने बताया कि कौटिल्य ने सदियों पहले लिखा था कि जिस तरह जीभ पर रखी शहद या विष का स्वाद न लेना असंभव है, उसी तरह किसी अधिकारी द्वारा राजा के राजस्व का प्रबंधन करते हुए उसमें से थोड़ा भी हिस्सा न लेना लगभग नामुमकिन है. हालांकि, अर्थशास्त्र में इसके समाधान के रूप में सख्त ऑडिटिंग, क्रॉस-वेरिफिकेशन और अवैध संपत्ति को जब्त करने जैसे प्रभावी उपाय भी सुझाए गए थे.
भारतीय न्यायपालिका और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता
CJI सूर्यकांत ने भारत के बहुस्तरीय कानूनी ढांचे और न्यायिक हस्तक्षेप का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने प्रत्यर्पण और पारस्परिक कानूनी सहायता के लिए कई देशों के साथ समझौते किए हैं. हालांकि, इसके बावजूद वास्तविक संपत्ति की वसूली का आंकड़ा बेहद निराशाजनक है.
उन्होंने जोर देकर कहा कि बिना सजा के संपत्ति जब्ती, बेनामी संपत्ति से जुड़े आदेश और वित्तीय खुफिया जानकारी साझा करने जैसे कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन जब तक अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और देश एक साथ मिलकर त्वरित कार्रवाई नहीं करेंगे, तब तक आर्थिक अपराधियों पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं होगा.




