नई दिल्ली. भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और शुचिता बनाए रखने के लिए एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा कदम उठाया है। अब मतदाता सूची (Voter List) तैयार करने या उसमें फेरबदल करने के नाम पर लापरवाही या जानबूझकर की गई धांधली अधिकारियों को भारी पड़ सकती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में सामने आए गंभीर अनियमितता के मामलों के बाद, आयोग ने दोषियों के खिलाफ केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित न रहकर सीधे तौर पर आपराधिक मुकदमे दर्ज करने का स्पष्ट निर्देश दिया है।
बीएनएस की धारा 198 के तहत पहली बार होगी सख्त कानूनी कार्रवाई
अब तक चुनावी सूचियों में गड़बड़ी या प्रशासनिक चूक के मामलों में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के तहत मुख्य रूप से विभागीय कार्रवाई या निलंबन जैसी अनुशासनात्मक कदम ही उठाए जाते थे। लेकिन अब आयोग ने अपने तेवर कड़े करते हुए निर्देश दिए हैं कि ऐसी गड़बड़ियों में शामिल पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 198 के तहत भी मुकदमे दर्ज किए जाएं।
यह संभवत: पहला ऐसा मौका है जब चुनाव प्रक्रिया में प्रशासनिक खामियों या गड़बड़ियों पर इस विशेष धारा के तहत कानूनी शिकंजा कसा जा रहा है। बीएनएस की धारा 198 मुख्य रूप से उन लोक सेवकों पर लागू होती है जो जानबूझकर कानून की अवहेलना करते हैं या अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग करते हैं। इस धारा के प्रावधानों के तहत दोषी पाए जाने वाले सरकारी कर्मचारी को एक साल तक का साधारण कारावास, जुर्माना, अथवा दोनों सजाएं एक साथ भुगतनी पड़ सकती हैं।
पीलीभीत मामले में क्या थी गड़बड़ी?
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से जुड़ा है, जहां एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई थीं। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (CEO) द्वारा भेजी गई विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर चुनाव आयोग ने त्वरित और कड़ा एक्शन लिया है।
जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि वहां के कंप्यूटर ऑपरेटर ने बिना किसी वैध आवेदन और पुख्ता दस्तावेजों के ही लगभग 10,000 मतदाताओं के नाम या तो सूची में जोड़ दिए थे या फिर हटा दिए थे। सबसे बड़ी लापरवाही यह रही कि संबंधित मतदाता पंजीयन अधिकारियों (EROs) ने बिना किसी उचित जमीनी या कागजी जांच के इन अवैध बदलावों को अपनी मंजूरी दे दी।
इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए चुनाव आयोग ने तत्काल प्रभाव से दो ईआरओ और एक डाटा एंट्री ऑपरेटर को निलंबित करने का आदेश जारी किया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन सभी को आयोग की पूर्व अनुमति के बिना सेवा में वापस बहाल नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, वोटर रजिस्ट्रेशन सेंटरों पर तैनात कंप्यूटर सहायकों की लॉगिन आईडी भी निरस्त कर दी गई हैं ताकि इस तरह की अवैध गतिविधियों पर पूरी तरह अंकुश लगाया जा सके।
प्रशासनिक तंत्र के लिए कड़ी चेतावनी
चुनाव आयोग के इस सख्त फैसले से पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है। मतदाता सूची देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधारस्तंभ होती है। इसे तैयार करने में किसी भी प्रकार की कोताही या मिलीभगत सीधे तौर पर लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाती है। आयोग के इन नए और कठोर दिशा-निर्देशों से स्पष्ट है कि भविष्य में चुनावी कार्यों में लापरवाही बरतने वाले किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा, और उन्हें जेल की हवा तक खानी पड़ सकती है।


