झारखंड में प्रशासनिक लापरवाही और अधिकारियों की सुस्ती का एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है, जहाँ समय पर न्याय न मिलने के कारण आखिरकार याचिकाकर्ता की सांसें थम गईं। झारखंड हाई कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए बेहद कड़ी फटकार लगाई है और उसकी 188 दिन की देरी से दायर की गई अपील याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकारी विभाग यह मानकर चल रहे हैं कि सीमा कानून उन पर लागू नहीं होते हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा कानूनी विवाद राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में कार्यरत उत्पल चक्रवर्ती से जुड़ा हुआ है। इस मामले में एकल पीठ ने 20 फरवरी 2025 को याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया था। लेकिन राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ अपील करने में 188 दिनों की भारी-भरकम देरी कर दी। जब कोर्ट में देरी माफी के लिए आवेदन दिया गया, तो उसमें यह अजीब बहाना बनाया गया कि फाइलें अलग-अलग अधिकारियों के बीच घूमती रहीं, जिसके कारण विलंब हुआ।
अकोर्ट की तीखी टिप्पणी और कट-पेस्ट हलफनामे
खंडपीठ ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक जटिलता, अंतर-विभागीय समन्वय और कानूनी सलाह जैसे घिसे-पिसे बहाने अब और स्वीकार नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि इस तरह के हलफनामे केवल ‘कट-पेस्ट’ जैसे प्रतीत होते हैं, जिनमें सच्चाई का भारी अभाव होता है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दो टूक कहा कि सरकारी अधिकारियों की लापरवाही की वजह से जनता को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।
इस पूरे प्रकरण का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि प्रशासनिक सुस्ती और कानूनी दांवपेंच के बीच देरी होने के कारण मूल याचिकाकर्ता उत्पल चक्रवर्ती की मृत्यु हो गई और वे अपने जीवनकाल में न्याय पाने से वंचित रह गए। हाई कोर्ट के इस कड़े रुख से एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।


