रांची. झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता को तार-तार करने वाले एक बड़े और सनसनीखेज मामले का खुलासा हुआ है। परीक्षा संचालन से जुड़ी एक निजी एजेंसी के पूर्व निदेशक और आईआईटी (IIT) कानपुर के पूर्व छात्र अरुण कुमार को झारखंड में हुए कई पेपर लीक कांडों का मुख्य सूत्रधार (मास्टरमाइंड) पाया गया है।
रांची पुलिस द्वारा अदालत में सौंपी गई केस डायरी से इस बात का खुलासा हुआ है कि तकनीक और उच्च शिक्षा के बल पर युवाओं का भविष्य संवारने के बजाय, इस मेधावी इंजीनियर ने बड़े पैमाने पर नौकरी के नाम पर धांधली और भ्रष्टाचार का काला साम्राज्य खड़ा कर रखा था।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा प्रकरण वर्ष 2021 की कनीय विद्युत अभियंता (JE) नियुक्ति परीक्षा में हुए पेपर लीक से जुड़ा है। झारखंड डिप्लोमा स्तर संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा-2021 के संचालन का जिम्मा मेसर्स बिंसिस टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड को सौंपा गया था। इस एजेंसी के पूर्व निदेशक अरुण कुमार ने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता का गलत फायदा उठाते हुए प्रश्न पत्रों की छपाई से लेकर डेटा लीक करने तक के खेल में अहम भूमिका निभाई।
जांच में यह भी सामने आया है कि गिरफ्तारी के बाद अरुण की संलिप्तता जेपीएससी (JPSC) की परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, ओएमआर शीट में हेराफेरी और अन्य अनियमितताओं में भी पाई गई है, जिसके चलते सीआईडी (CID) ने भी उसके खिलाफ मामला दर्ज कर पूछताछ की थी।
इस तरह चलता था धांधली का खेल
पुलिस की जांच के मुताबिक, अरुण कुमार ने 2019 में ही एजेंसी के निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन यह केवल कागजी खानापूर्ति (आई वाश) साबित हुआ। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) के तत्कालीन अधिकारियों के बयानों से यह पुष्टि हुई है कि निदेशक पद से हटने के बावजूद वह एजेंसी की हर गोपनीय और उच्च स्तरीय बैठक में सक्रिय रूप से शामिल रहता था।
गिरफ्तार आरोपियों और अभ्यर्थियों से पूछताछ में यह बात सामने आई है कि अरुण कुमार और उसके सिंडिकेट ने प्रत्येक अभ्यर्थी से 15 लाख रुपये या उससे अधिक की रकम वसूली थी। इसके बदले में परीक्षा से पहले ही सीलबंद प्रश्न पत्र व्हाट्सएप के जरिए लीक कर दिए जाते थे और अभ्यर्थियों को गुप्त ठिकानों पर ले जाकर उनके उत्तर रटवाए जाते थे।
कानूनी शिकंजा
रांची पुलिस ने इस मामले में गहनता से जांच करते हुए गत अगस्त महीने में आरोपी अरुण कुमार को मुंबई से गिरफ्तार किया था। इस प्रकार की घटनाएं इस बात का बड़ा उदाहरण हैं कि कैसे कुछ लोग अपने उच्च तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल शिक्षा व्यवस्था और ईमानदार युवाओं के सपनों को कुचलने के लिए करते हैं। फिलहाल, इस मामले के खुलासे से राज्य की प्रतियोगी परीक्षा प्रणालियों की सुरक्षा और निजी एजेंसियों की भूमिका पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।


