लखनऊ. उत्तर प्रदेश में पुलिसिंग और कानून-व्यवस्था के दावों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजधानी लखनऊ के बहुचर्चित शिवा शर्मा हत्याकांड में मुख्य आरोपी मॉडल श्रद्धा दुबे की गिरफ्तारी न हो पाना और इसके बाद सामने आए घटनाक्रम ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में ला खड़ा किया है। महज 12 से 24 घंटों के भीतर हुए बड़े प्रशासनिक फेरबदल ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि महकमे के भीतर लापरवाही और लचर रवैये को अब बर्दाश्त नहीं किया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
लखनऊ के हजरतगंज थाना क्षेत्र स्थित एक अपार्टमेंट की चौथी मंजिल से गिरकर कारोबारी शिवा शर्मा की 9 अक्टूबर को संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई थी। घटना के समय शिवा के शरीर पर केवल अंडरवियर था। मृतक की मां ने फ्लैट में मौजूद मॉडल श्रद्धा दुबे, उसकी बहन रश्मि दुबे और अन्य लोगों पर उनके बेटे को फेंककर हत्या करने का गंभीर आरोप लगाया। मामला दर्ज होते ही मुख्य आरोपी श्रद्धा फरार हो गई। पुलिस के हाथ 10 दिन बीत जाने के बाद भी खाली रहे, जबकि आरोपी मॉडल ने बेधड़क होकर सोशल मीडिया पर वीडियो जारी किए और मीडिया चैनलों को इंटरव्यू भी दे दिए।
पुलिस महकमे में हड़कंप और ताबड़तोड़ एक्शन
फरार चल रही 50 हजार की इनामी श्रद्धा दुबे तक जहां पुलिस की टीमें नेपाल बॉर्डर से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक खाक छानती रह गईं, वहीं मीडिया कैमरे और इंटरव्यू ने लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की भारी फजीहत करा दी। इस हाईप्रोफाइल मामले में किरकिरी होने के बाद पुलिस प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया:
पहला एक्शन: रविवार दोपहर को हजरतगंज थाने के इंचार्ज इंस्पेक्टर विक्रम सिंह को उनकी कोतवाली से हटाकर सीधे लाइन हाजिर कर दिया गया।
दूसरा ऐक्शन: कुछ ही घंटों के भीतर डीसीपी मध्य के पद पर तैनात आईपीएस अधिकारी विक्रांत वीर को भी उनके पद से हटाते हुए पुलिस मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया।
पुलिसिंग की कार्यशैली पर सवालिया निशान
यह पूरा घटनाक्रम उत्तर प्रदेश पुलिस की खुफिया तंत्र और त्वरित कार्रवाई के दावों की पोल खोलता नजर आता है। जब एक तरफ सरकार राज्य में अपराधियों पर शिकंजा कसने और कानून का राज स्थापित करने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर एक इनामी आरोपी पुलिस की पकड़ से दूर मीडिया को इंटरव्यू देती है। इस मामले ने यह साबित कर दिया है कि यदि जमीनी स्तर पर लचर निगरानी और सुस्त पैरवी हो, तो उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को भी गाज का सामना करना पड़ता है।
फिलहाल, पुलिस ने आरोपियों पर इनाम की राशि 25 हजार से बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी है और फरार ड्राइवर दानिश तथा अन्य की तलाश में दबिश तेज कर दी है। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर से यह बहस छेड़ दी है कि क्या उत्तर प्रदेश पुलिस हाईप्रोफाइल मामलों में दबाव के आगे सुस्त पड़ जाती है?


