हरिद्वार. वर्ष 2006 में पूरे देश की रूह कंपा देने वाले कुख्यात निठारी कांड (Nithari Case) से जुड़ी एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है. इस बहुचर्चित मामले में पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट से बरी हुए सुरेंद्र कोली (Surendra Koli) का शव उत्तराखंड के हरिद्वार में फंदे से लटका हुआ मिला.
पुलिस की शुरुआती जांच के अनुसार, उसने अपनी पहचान छिपाकर चाय की दुकान चलाने के दौरान कथित तौर पर आत्महत्या कर ली है. इस घटना के साथ ही उस खौफनाक और बड़े चेहरे का अंत हो गया है, जिसका नाम नोएडा के उस डरावने बंगले से जुड़े नरसंहार के मुख्य किरदारों में शुमार था.
अदालती सफर और कानूनी दांवपेंच: एक नजर
निठारी कांड की शुरुआत दिसंबर 2006 में उस वक्त हुई थी, जब नोएडा के सेक्टर-31 स्थित मोनिंदर सिंह पंढेर (Moninder Singh Pandher) की डी-5 कोठी के पीछे नाले से बच्चों की खोपड़ियां, कंकाल और उनके कपड़े बरामद हुए थे. इस खुलासे के बाद देश-विदेश में हड़कंप मच गया था और इस बंगले को ‘हाउस ऑफ हॉरर्स’ का नाम दिया गया. इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई, जिसने सुरेंद्र कोली पर अपहरण, बलात्कार, हत्या और सबूत मिटाने के गंभीर आरोप लगाए.
- निचली अदालतों का फैसला: वर्ष 2009 से 2017 के बीच निचली अदालतों ने सुरेंद्र कोली को कई मामलों में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी. साल 2014 में तो स्थिति ऐसी आ गई थी कि उसकी दया याचिका खारिज होने के बाद उसे मेरठ जेल में फांसी पर लटकाने की पूरी तैयारी कर ली गई थी, लेकिन आधी रात को सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से उसकी फांसी पर रोक लग गई थी.
- सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, पिछले साल नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में सुरेंद्र कोली के खिलाफ बचे आखिरी मामलों में भी उसकी क्यूरेटिव पिटीशन स्वीकार करते हुए उसे बरी कर दिया और तुरंत रिहाई के आदेश दिए.
- अदालत ने अपने फैसले में माना कि कोली के खिलाफ केवल परिस्थितिजन्य सबूत थे, जिनका कोई ठोस फॉरेंसिक या चिकित्सीय आधार नहीं था. इसके साथ ही, जांच में गंभीर खामियों और बच्चों के अंग व्यापार (ऑर्गन ट्रेड) के पहलुओं की ठीक से जांच न होने का जिक्र भी किया गया.
एक बड़े चेहरे का अंत और अनसुलझा सवाल
सुरेंद्र कोली की इस संदिग्ध मौत के साथ ही भारतीय न्याय और अपराध इतिहास के एक सबसे विवादित और पहेलीनुमा अध्याय का एक बड़ा चेहरा हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गया है. जेल से छूटने के बाद वह गुमनामी की जिंदगी बिताने हरिद्वार चला गया था, जहां वह सप्त सरोवर रोड पर एक छोटी सी चाय की दुकान चलाकर अपना गुजारा कर रहा था.
जेल से लगभग 19 साल की लंबी कैद के बाद बाहर आने के बाद समाज में दोबारा खुद को न ढाल पाना, अकेलापन और आंतरिक तनाव को उसकी इस आत्मघाती कदम की वजह माना जा रहा है. हालांकि, मौके से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है, लेकिन कोली की इस दुखद और अचानक मौत के साथ ही यह सवाल हमेशा के लिए अनसुलझा रह गया कि आखिर उन 13 मासूम बच्चों की मौत का असली और मुख्य गुनहगार कौन था.
पंढेर और कोली दोनों के कानूनी रूप से बरी होने के बाद, निठारी कांड भारत के इतिहास का सबसे बड़ा और अधूरा रहस्य बनकर रह गया है, जिसका जवाब शायद कभी नहीं मिल सकेगा.



