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Home » सत्ता की घेराबंदी और सलाखों के पीछे से गूंजती सच की आवाज, रूपेश कुमार सिंह के संघर्ष के चार साल
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सत्ता की घेराबंदी और सलाखों के पीछे से गूंजती सच की आवाज, रूपेश कुमार सिंह के संघर्ष के चार साल

Ocean News DeskBy Ocean News DeskJuly 17, 2026
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  • झारखंड के पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की चार साल से सलाखों के पीछे कैद होने की कहानी 

रांची/पटना. 17 जुलाई 2022 की वह सुबह जब झारखंड के स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह के दरवाज़े पर पुलिस की भारी फ़ौज पहुंची थी, तब शायद किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि यह सिर्फ़ एक गिरफ़्तारी नहीं, बल्कि व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक लंबे और अनवरत संघर्ष की शुरुआत थी. आज उस घटना को पूरे चार साल बीत चुके हैं.

हाशिए पर खड़े समाज, जल-जंगल-ज़मीन और मानवाधिकारों की आवाज़ बुलंद करने वाले रूपेश आज भी सलाखों के पीछे हैं, लेकिन उनकी क़लम और अन्याय के ख़िलाफ़ उनका प्रतिरोध आज भी कम नहीं हुआ है.

जनसरोकार की पत्रकारिता और सत्ता की खिन्नता

रूपेश कुमार सिंह की गिरफ़्तारी से ठीक एक दिन पहले, यानी 16 जुलाई 2022 को, उन्होंने एक गंभीर मानवीय मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट साझा की थी. वे एक 9 साल की बच्ची के चेहरे के ट्यूमर के इलाज के लिए प्रयासरत थे. लेकिन जैसे ही वे इस बात से निश्चिंत हुए कि बच्ची के इलाज का प्रबंध हो गया है, अगली ही सुबह पुलिस ने उनके घर को घेर लिया.

आलोचकों और स्वतंत्र मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि रूपेश की यही जन-उन्मुख मुस्तैदी और सत्ता के दमनकारी रवैये पर तीखे सवाल दागना व्यवस्था को खटक रहा था, जिसकी परिणति इस गिरफ़्तारी के रूप में हुई.

जेल की दीवारों के बीच भी जारी है भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जंग

रूपेश कुमार सिंह को पिछले चार वर्षों में झारखंड और बिहार की छह अलग-अलग जेलों में स्थानांतरित किया जा चुका है. आरोप है कि यह बार-बार होने वाले तबादले जेल प्रशासन के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था के ख़िलाफ़ उनके द्वारा की गई भूख हड़तालों और आवाज़ उठाने की सज़ा है.

हाल ही में, 24 जून 2026 को पटना की बेऊर जेल के अधीक्षक नीरज झा सहित कई अधिकारियों का निलंबन इसी बात का प्रमाण है. रूपेश ने 15 जनवरी 2026 को पटना के जिलाधिकारी को एक पत्र लिखकर जेल की 12 गंभीर अनियमितताओं को उजागर किया था. इसके बाद, भागलपुर जेल भेजे जाने पर भी उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कैदियों की हकमारी और बदहाल बुनियादी ढाँचे का मुद्दा उठाया, जिसके बाद प्रशासन को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े.

शिक्षा और सकारात्मकता, विपरीत परिस्थितियों में भी जीवंत

तमाम मानसिक और शारीरिक प्रताड़नाओं (जैसे ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर 435 तक पहुँचना और साइनस-एंग्जायटी जैसी बीमारियाँ) के बावजूद रूपेश ने हार नहीं मानी है. उन्होंने जेल के भीतर रहकर:

वर्ष 2024 में इतिहास में एमए की डिग्री पूरी की. 25 जून 2026 को यूजीसी-नेट (UGC-NET) की परीक्षा दी. वर्तमान में वे राजनीति विज्ञान में एक और एमए करने के लिए एनआईए कोर्ट से अनुमति मांग चुके हैं.

सह-बंदियों के अनुसार, उन्होंने जेल के माहौल को सुधारने, बंदियों को नशे और गाली-गलौज से दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

जीवनसाथी ईप्सा शताक्षी के अनुसार, रूपेश अब तक जेल में लगभग 150 किताबें पढ़ चुके हैं. रूपेश कुमार सिंह का यह चार साल का सफ़र यह दिखाता है कि एक प्रतिबद्ध पत्रकार को शारीरिक रूप से तो कैद किया जा सकता है, लेकिन उसके वैचारिक संघर्ष और सच कहने के साहस को सलाखों के पीछे भी दबाया नहीं जा सकता.

स्वतंत्र पत्रकारिता के इस दौर में रूपेश की यह लड़ाई केवल उनकी व्यक्तिगत न्याय की मांग नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की अस्मिता की रक्षा का भी प्रतीक है.

रिपोर्ट सौजन्य से … द वायर

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