विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ में भारत का 180 देशों में 157वें स्थान पर होना पहले ही चिंताजनक है
नई दिल्ली. हाल ही में भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के एक अधिकारी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘अनस्क्रिप्टेड’ (बिना पूर्व-निर्धारित) प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के फैसले का बचाव करने की कोशिश ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है. पत्रकारों के शीर्ष संगठन, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इस बचाव को ‘सतही’ और ‘भ्रामक’ बताते हुए इसकी तीखी आलोचना की है. गिल्ड का यह बयान लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है.
क्या था पूरा विवाद?
यह विवाद प्रधानमंत्री के न्यूज़ीलैंड दौरे के दौरान तब शुरू हुआ, जब वहां की एक प्रेस ब्रीफिंग में स्थानीय पत्रकार ने पीएम मोदी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस न किए जाने पर सवाल उठाया. जवाब में विदेश मंत्रालय के अधिकारी रुद्रेंद्र टंडन ने पीएम का बचाव करते हुए तर्क दिया कि वे ‘बिचौलियों’ (मीडिया) के ज़रिये बात करने के बजाय जनता से सीधा संपर्क पसंद करते हैं, क्योंकि भारतीय वोटर (विशेषकर ग्रामीण) सीधा संवाद चाहते हैं.
गिल्ड की आपत्ति और लोकतंत्र का मूल सिद्धांत
एडिटर्स गिल्ड ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए याद दिलाया कि लोकतंत्र में जनता की ओर से सत्ता से तीखे सवाल पूछना मीडिया का बुनियादी अधिकार और कर्तव्य है.
एकतरफा संवाद बनाम जवाबदेही: सोशल मीडिया या प्रबंधित (Managed) रैलियों के ज़रिए किया जाने वाला संवाद हमेशा एकतरफा होता है. यह स्वतंत्र पत्रकारों के साथ होने वाली जिरह का विकल्प नहीं हो सकता.
सवालों से दूरी: गिल्ड ने हालिया ऊर्जा संकट जैसे गंभीर मुद्दों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी का भी उल्लेख किया.
प्रेस को ‘बिचौलिया’ कहना न सिर्फ पत्रकारिता के पूरे तंत्र को कमतर आंकना है, बल्कि यह स्वतंत्र आवाजों को दबाने जैसा है.
वैश्विक स्तर पर उठते सवाल
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूरी पर सवाल उठे हैं. उनके यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड दौरों के दौरान नॉर्वे और नीदरलैंड के पत्रकारों ने भी सार्वजनिक रूप से पूछा था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता प्रेस के तीखे सवालों का सामना क्यों नहीं करते? ऑस्ट्रेलिया के स्काई न्यूज़ ने भी पीएम के कार्यक्रमों को ‘कूटनीति के बजाय राजनीति’ करार दिया था.
‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ में भारत का 180 देशों में 157वें स्थान पर होना पहले ही चिंताजनक है. ऐसे में सरकारी अधिकारियों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने की संस्कृति को जायज ठहराना अभिव्यक्ति की आज़ादी को और कमज़ोर करता है. लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब सत्ता में बैठे लोग स्वतंत्र मीडिया के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह हों, न कि सवालों से कतराकर केवल एकतरफा नैरेटिव (Narrative) गढ़ें.
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