अहमदाबाद. देश की महत्वाकांक्षी और पहली मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना (Mumbai-Ahmedabad Bullet Train Project) इस वक्त एक बड़े कानूनी और अभूतपूर्व आर्थिक संकट से जूझ रही है. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (LARRA) द्वारा जमीन के मुआवजे में की गई भारी-भरकम बढ़ोतरी के चलते इस प्रोजेक्ट पर करीब ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की आशंका पैदा हो गई है. इस अप्रत्याशित खर्चे ने नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन (NHSRCL) के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिसके बाद अब यह पूरा विवाद गुजरात हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है.
₹50 से सीधे ₹660 प्रति वर्ग मीटर, कैसे बढ़ा विवाद?
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ गुजरात के भरूच जिले के अमोद तालुका में स्थित ओच्छन गांव से जुड़ी है.
शुरुआती मूल्यांकन: साल 2018 में बुलेट ट्रेन के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई थी. इसके बाद 2020 में सक्षम प्राधिकारी ने ₹50 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा तय किया, जिसके तहत एक जमीन मालिक को करीब ₹85.8 लाख का भुगतान किया गया था.
LARRA का फैसला: इस मूल्यांकन से असंतुष्ट होकर जमीन मालिकों ने LARRA का रुख किया. प्राधिकरण ने मामले की समीक्षा करने के बाद मुआवजे की दर को सीधे ₹660 प्रति वर्ग मीटर कर दिया. इस एक फैसले से संबंधित जमीन का कुल मुआवजा ₹85.8 लाख से बढ़कर सीधे ₹8.4 करोड़ पर पहुंच गया.
प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की दलील, ‘अव्यावहारिक है यह फॉर्मूला’
बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के प्रबंधन (NHSRCL) ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है. उनका तर्क है कि LARRA ने नया मुआवजा तय करते समय स्थापित नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया. नियमों के मुताबिक, मुआवजा आसपास की समान प्रकृति वाली जमीनों के औसत बाजार मूल्य के आधार पर तय होना चाहिए. लेकिन प्राधिकरण ने ओच्छन गांव के पास की जमीनों को छोड़कर, वहां से 14 किलोमीटर दूर स्थित ‘सिमार्था’ नामक एक व्यावसायिक क्षेत्र की दरों को आधार बना लिया.
प्रबंधन का कहना है कि अगर इसी फॉर्मूले को पूरे बुलेट ट्रेन कॉरिडोर पर लागू किया गया, तो संचित ब्याज मिलाकर कुल अतिरिक्त खर्च ₹40,000 करोड़ से अधिक हो जाएगा. इतनी बड़ी रकम ₹1.10 लाख करोड़ की इस पूरी परियोजना के मूल बजट को पूरी तरह बिगाड़ देगी.
हाईकोर्ट में महाधिवक्ता की चेतावनी, 5 अगस्त को अगली सुनवाई
मामले की सुनवाई के दौरान गुजरात के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने अदालत में बेहद गंभीर रुख अपनाते हुए चेतावनी दी कि यदि LARRA के इस संशोधित आदेश को नहीं बदला गया, तो बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा पाना पूरी तरह असंभव हो जाएगा. उन्होंने कहा, “यदि यह ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ परियोजना पर डाला गया, तो देश का यह ड्रीम प्रोजेक्ट अधर में लटक जाएगा.”
गुजरात हाईकोर्ट ने फिलहाल सूरत और भरूच जिलों से जुड़े तीन मुख्य मामलों में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की अपील को स्वीकार कर लिया है. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त तय की है, जिसमें यह फैसला लिया जा सकता है कि LARRA के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई जाए या नहीं. फिलहाल, भारत की पहली बुलेट ट्रेन की रफ्तार और भविष्य इसी सुनवाई पर टिका हुआ है.





